पातंजल योग सूत्र योग दर्शन | Patanjal Yoga Sutras and Yoga Darshan

- श्रेणी: योग / Yoga
- लेखक: महर्षि पतंजलि - Maharshi Patanjali
- पृष्ठ : 250
- साइज: 9 MB
- वर्ष: 1975
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दो शब्द :
पातंजल योग सूत्र योग के दर्शन पर आधारित एक गहन अध्ययन है, जिसमें "प्रकृति" और "पुरुष" (चेतन आत्मा) के बीच के संबंध को समझाया गया है। इन दोनों तत्वों का अनादि संबंध है और इनके संयोग से समस्त सृष्टि का निर्माण होता है। प्रकृति जड़ है और इसमें सत्व, रज और तम गुण विद्यमान हैं। जब ये गुण चेतन आत्मा (पुरुष) के साथ मिलते हैं, तब सृष्टि की प्रक्रिया आरंभ होती है। योग का मुख्य उद्देश्य आत्मा के साथ जुड़ना है, जिससे व्यक्ति अपने असली स्वरूप को पहचान सके। योग की विभिन्न विधियाँ हैं, जैसे राजयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि, लेकिन सबका अंतिम लक्ष्य आत्मा का अनुभव करना है। महर्षि पतंजलि ने योग को चित्त की वृत्तियों का निरोध कहा है, क्योंकि जब चित्त की वृत्तियाँ रुकती हैं, तब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होती है। पतंजलि ने अष्टांग योग का मार्ग प्रस्तुत किया है, जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि शामिल हैं। यह मार्ग साधकों के लिए सुरक्षित और प्रभावी है। योग दर्शन यह बताता है कि प्रकृति और पुरुष का संयोग जीव के विकास का कारण है, और अज्ञान (अविद्या) के कारण ही इन दोनों के बीच का भेद मिट जाता है। जब साधक अज्ञान के आवरण को हटाकर अपने असली स्वरूप को पहचान लेता है, तब वह मोक्ष की प्राप्ति करता है। यह योग दर्शन सार्वभौमिक और वैज्ञानिक है, जिसमें किसी भी प्रकार की धार्मिक संकीर्णता नहीं है। आत्मज्ञान के लिए साधक को खुद प्रयास करना होता है, और केवल ग्रंथों का अध्ययन करना पर्याप्त नहीं है। इस ग्रंथ का उद्देश्य सामान्य जनों में योग साधना की रुचि जाग्रत करना और उन्हें इस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना है। अंततः, योग का अभ्यास व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सकता है, जिससे वह अपनी अंतिम परिणति, मोक्ष, को प्राप्त कर सकता है।
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