इंद्रजाल | Inderjal

- श्रेणी: नाटक/ Drama
- लेखक: रघुनाथ सिंह - Raghunath Singh
- पृष्ठ : 186
- साइज: 5 MB
- वर्ष: 1941
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दो शब्द :
"इन्द्रजाल" उपन्यास की भूमिका में प्रो. डा. भीखनूछाल आत्रेय ने लेखक ठाकुर रघुनाथसिंह द्वारा लिखित इस उपन्यास के संदर्भ में अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं। यह उपन्यास संस्कृत ग्रंथ योगवासिष्ठ के 'इन्द्रजाल' उपाख्यान पर आधारित है। लेखक ने उपन्यास को दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है, जिसमें काव्यात्मक भाषा का प्रयोग किया गया है। आत्रेय ने योगवासिष्ठ को अद्भुत और महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रंथ माना है, जिसमें गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों को सरलता से समझाने के लिए अनेक उपाख्यानों का उपयोग किया गया है। उपन्यास की कहानी में दर्शाया गया है कि सारा संसार मन के भीतर है और यह सब स्वप्न के समान है। लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से योगवासिष्ठ के सिद्धांतों को जनसाधारण में फैलाने का प्रयास किया है। आत्रेय ने उपन्यास के गुण और कमियों पर भी विचार किया है, जैसे कि भाषा की कठिनाई और कहानी की गहराई। उन्होंने लेखक और प्रकाशक का धन्यवाद किया कि उन्होंने इस महत्वपूर्ण कार्य को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया। इस प्रकार, "इन्द्रजाल" उपन्यास केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह दार्शनिक विचारों और मनोवैज्ञानिक तत्वों का समावेश कर एक नई दृष्टि प्रस्तुत करता है, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है।
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