कर्मयोग संस्करण-१३ | Karamyog Sanskaran-13

By: स्वामी विवेकानंद - Swami Vivekanand
कर्मयोग संस्करण-१३ | Karamyog Sanskaran-13 by


दो शब्द :

इस पाठ का सारांश इस प्रकार है: "कर्मयोग" स्वामी विवेकानन्द की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है, जिसमें उन्होंने मानव जीवन के उद्देश्य और कर्मों का महत्व बताया है। स्वामी विवेकानन्द का मानना है कि कर्म का असली उद्देश्य ज्ञान का प्राप्ति है, और सुख की खोज में अज्ञानता से दूर रहकर ज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए। उन्होंने बताया कि सुख और दुःख मानव जीवन के अनिवार्य भाग हैं और दोनों हमें शिक्षा देते हैं। पुस्तक में कर्म का अर्थ केवल कार्य करना नहीं, बल्कि कर्मफल की अपेक्षा किए बिना कार्य करना है। स्वामीजी ने यह भी कहा है कि कर्म करते समय अनासक्ति का भाव होना चाहिए, जिससे व्यक्ति अपने कार्यों से बंधा न हो। वे यह समझाते हैं कि संसार में सभी कार्यों में आसक्ति हमें बंधन में डालती है और हमारे विकास में रुकावट बनती है। स्वामी विवेकानन्द ने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने की बात भी की है, जिससे व्यक्ति को किसी भी फल की अपेक्षा न हो। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि परोपकार करना हमारे लिए अपने आप को बेहतर बनाने का एक साधन है, और असली भलाई दूसरों की भलाई में छिपी है। इस प्रकार, यह पुस्तक हमें सिखाती है कि अपने कार्यों को निःस्वार्थ भाव से करना चाहिए और जीवन में ज्ञान की प्राप्ति के लिए कर्मयोग का पालन करना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द का संदेश है कि कर्म करते रहो, परंतु उसके फल की चिंता न करो, क्योंकि सच्चा कर्म वही है, जिसमें केवल सेवा भाव हो।


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