ब्रम्हचर्य ही जीवन है | Bhramcharya hi jiwan hai

By: शिवानंद - Shivanand


दो शब्द :

इस पाठ में ब्रह्मचर्य (संवेदनाओं और इच्छाओं पर नियंत्रण) और स्वास्थ्य के महत्व पर चर्चा की गई है। लेखक ने बताया है कि आजकल लोग अनेक रोगों और समस्याओं का सामना करते हैं, जो मुख्यतः अज्ञानता और अनियंत्रित जीवनशैली के कारण होते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि समाज में व्यभिचार और अन्य नकारात्मक प्रभावों के कारण युवा पीढ़ी रोगों से ग्रसित हो रही है, जिससे उनका जीवन और स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। लेखक ने ध्यान दिलाया है कि युवा लड़के और लड़कियाँ अक्सर अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज करते हैं और गलत संगत में पड़कर अपने जीवन को बर्बाद कर देते हैं। उन्होंने विभिन्न लक्षणों का उल्लेख किया है, जो इस बात का संकेत होते हैं कि व्यक्ति का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। इसके अलावा, वे वैद्य और दवाइयों के प्रति भी चेतावनी देते हैं, यह बताते हुए कि कोई भी दवा व्यक्ति को ब्रह्मचारी या स्वस्थ नहीं बना सकती; इसके लिए मन की पवित्रता और संयम आवश्यक है। लेखक ने यह भी कहा है कि रोगी व्यक्ति किसी भी कार्य में सक्षम नहीं होता और उसकी स्थिति बहुत कठिन होती है। उन्होंने स्वस्थ जीवन के लिए शरीरबल, ज्ञानबल और आत्मबल की आवश्यकता पर जोर दिया है। शरीर का स्वास्थ्य सभी शक्तियों का आधार है, और इसके बिना व्यक्ति स्वतंत्र और सुखी नहीं रह सकता। अंत में, लेखक ने यह निष्कर्ष निकाला है कि केवल शुद्ध मन और संयमित जीवनशैली ही व्यक्ति को स्वस्थ और बलवान बना सकती है, जिससे वह जीवन के संघर्षों में सफल हो सके।


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