गीता दर्शन भाग २ | Geeta Darshan part 2

By: आचार्य श्री रजनीश (ओशो) - Acharya Shri Rajneesh (OSHO)


दो शब्द :

इस पाठ में ओशो ने मानव समाज के चार मुख्य वर्गों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र) के मनोविज्ञान और उनके जीवन के उद्देश्यों पर चर्चा की है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि प्रत्येक वर्ग का अपना स्वधर्म होता है, जो उनके व्यक्तित्व और आकांक्षाओं का आधार बनता है। ब्राह्मण वर्ग ज्ञान की खोज में रहता है, जबकि क्षत्रिय शक्ति की खोज में। ओशो ने नीत्से का उदाहरण देकर बताया कि कुछ लोग शक्ति के प्रति इतने आकर्षित होते हैं कि वे उसके बिना जीवन की गहराई को नहीं समझ पाते। वैश्य वर्ग धन की महत्ता पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि चौथा वर्ग सेवा और समर्पण में संतोष पाता है। ओशो ने यह भी कहा कि जन्म से निर्धारित वर्ण व्यवस्था के बजाय, व्यक्ति के स्वधर्म का पता उसकी आकांक्षाओं और जीवन के लक्ष्यों से चलता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वर्ण व्यवस्था का कोई सामाजिक अनाचार नहीं होना चाहिए, बल्कि यह एक वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सिद्धांत होना चाहिए। कृष्ण और अर्जुन के संवाद के माध्यम से ओशो ने कहा कि अर्जुन को अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करना चाहिए, क्योंकि यही उसके व्यक्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा है। उन्होंने बताया कि व्यक्ति को अपने स्वधर्म का पालन करते हुए ही आत्मा की पूर्णता और परमात्मा की प्राप्ति की ओर बढ़ना चाहिए। अंत में, ओशो ने कहा कि मूल्य व्यक्ति के वर्ण में निहित होता है, और विभिन्न वर्गों के लिए धन और शक्ति का मूल्य अलग-अलग होता है। इस प्रकार, ओशो ने समाज के चार वर्गों की विशेषताओं और उनके स्वधर्म के महत्व को गहराई से समझाया है।


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