पृथ्वी राज रासो | Prithviraj Raso

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पृथ्वी राज रासो | Prithviraj Raso by


दो शब्द :

"पृथ्वीराज रासो" हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें पृथ्वीराज चौहान के इतिहास और उनकी वीरता का वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ की प्रामाणिकता पर विद्वानों के बीच विवाद है; कुछ इसे पूरी तरह से प्रामाणिक मानते हैं, जबकि अन्य इसे आंशिक रूप से प्रामाणिक मानते हैं। इस विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि क्या पृथ्वीराज के समकालीन कवि चंद नामक कोई व्यक्तित्व वास्तव में थे और क्या उन्होंने इस ग्रंथ की रचना की। "पृथ्वीराज रासो" की साहित्यिक महत्ता भी है, और इसे विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, लेकिन इसके विशाल आकार के कारण इसे संक्षेप में प्रस्तुत करना कठिन है। इसके अंशों से रासो की महिमा का सही परिचय नहीं मिलता। विद्वानों का मानना है कि पृथ्वीराज रासो में ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन है, लेकिन इसके साथ ही इसमें कल्पना का भी समावेश है, जिससे इसकी ऐतिहासिकता संदिग्ध हो जाती है। इस ग्रंथ में वर्णित घटनाएँ, विवाह और युद्ध, भारतीय काव्य की परंपरा में ऐतिहासिक तथ्यों के बजाय कल्पना पर अधिक आधारित हैं। ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम पर काव्य रचनाएँ लिखने की प्रथा उस काल में प्रचलित थी, लेकिन कवियों ने अक्सर घटनाओं को अधिक काव्यात्मक और रोमांचक बनाने के लिए उनका मनमाना विवरण प्रस्तुत किया। ग्रंथ में नायक को हमेशा गुणी और वीर दिखाने की प्रवृत्ति रही है, जिससे वास्तविक जीवन की जटिलताएँ और संघर्ष छिप जाते हैं। इस प्रकार, ऐतिहासिक काव्य और निर्जंघरी कथाएँ, दोनों में वास्तविकता का एक अनूठा मिश्रण है, लेकिन "पृथ्वीराज रासो" में ऐतिहासिकता को सही तरीके से प्रस्तुत करने में विफलता दिखाई देती है। अंततः, जबकि "पृथ्वीराज रासो" की ऐतिहासिकता पर सवाल उठाए जा सकते हैं, इसका साहित्यिक मूल्य और भारतीय काव्य परंपरा में इसका स्थान महत्वपूर्ण बना हुआ है। विद्वानों का मानना है कि यह ग्रंथ कुछ प्राचीन तत्वों को समेटे


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