आपाढ का एक दिन | Aashad ka ek Din

By: मोहन राकेश - Mohan Rakesh
आपाढ का एक दिन | Aashad ka ek Din by


दो शब्द :

पाठ "आषाढ़ का एक दिन" में कवि कालिदास के जीवन के एक महत्वपूर्ण पल का चित्रण किया गया है। यह नाटक आषाढ़ के पहले दिन की मनोहरता के बीच शुरू होता है, जब कालिदास अपनी प्रिय मल्लिका के साथ प्रकृति की सुंदरता का आनंद ले रहे होते हैं। इस बीच, एक घायल मृग-शावक को देखकर कालिदास का हृदय द्रवित हो जाता है और वह उसे उपचार के लिए मल्लिका के घर ले जाते हैं। इस दौरान, राजकीय दूत दन्तुल उन पर तलवार ताने हुए उनकी भर्त्सना करते हैं। मल्लिका की साहसिकता से प्रभावित होकर दूत कालिदास को राजसभा में आमंत्रित करने का कार्य करते हैं। कालिदास को राजसभा में जाने का निमंत्रण मिलने पर मल्लिका उनकी प्रेरणा बनती हैं। नाटक में कालिदास का गांव छोड़कर उज्जयिनी जाने का संघर्ष और मल्लिका के प्रति उनके प्रेम को दर्शाया गया है। कालिदास को राजकवि की पदवी मिलती है और राजा की बेटी प्रियंगुमंजरी से उनका विवाह होता है। कई वर्षों बाद, कालिदास काश्मीर से लौटते हैं, जहां मल्लिका उनकी रचनाओं का अध्ययन करती रही हैं। दोनों का पुनर्मिलन होता है, जहां कालिदास अपनी काव्य-प्रेरणा के स्रोत के रूप में मल्लिका को मानते हैं। अंततः, मल्लिका अपने नवजात शिशु के साथ कालिदास को विदा करती हैं, जो कि एक भावनात्मक और गहन क्षण है। यह नाटक न केवल कालिदास के जीवन की जटिलताओं को दर्शाता है, बल्कि यह प्रेम, त्याग और काव्य की शक्ति को भी उजागर करता है। इसे आधुनिक नाट्य साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है, जहां चरित्र चित्रण और मनोवैज्ञानिक गहराई का उत्कृष्ट मिश्रण देखने को मिलता है।


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