बाल मनोविज्ञान | Baal Manovigyan

- श्रेणी: मनोवैज्ञानिक / Psychological शिक्षा / Education
- लेखक: जगदानन्द पाण्डेय - Jagdanand Pandey
- पृष्ठ : 348
- साइज: 20 MB
- वर्ष: 1956
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दो शब्द :
इस पाठ में बच्चों के संवेगात्मक विकास के महत्व और उसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। बच्चों के संवेगात्मक विकास के लिए स्वप्रकाशन और आत्मनिर्भरता आवश्यक होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के विकास में अनावश्यक प्रतिबंध न लगाएँ। उत्तेजक परिस्थितियों का ज्ञान बच्चों के संवेगात्मक संतुलन में मदद करता है। उदाहरण के तौर पर, यदि बच्चे को अंधेरे से डरने का कारण समझा दिया जाए, तो वह उस भय को नियंत्रित कर सकता है। पाठ में संवेगों के अध्ययन के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक पद्धतियों का उल्लेख किया गया है। इनमें भावभंगी और व्यवहार निरीक्षण, विद्युत प्रतिक्रिया, और आंतरिक परिवर्तनों का निरीक्षण शामिल हैं। इन विधियों से बच्चों के संवेगों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, हालांकि कुछ पद्धतियाँ सीमित और विश्वसनीय नहीं मानी जाती हैं। अंत में, पाठ में संवेगों के विकास के लिए आवश्यक उपायों और शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया गया है। संवेगों का उचित विकास न केवल बच्चों के व्यक्तिगत विकास में सहायक है, बल्कि उनके भविष्य के जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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