श्रीं योगवासिष्ठ महारामायण भाग १ | Shree Yogavashisth maharamayana part 1

By: महर्षि वाल्मीकि - Maharshi valmiki


दो शब्द :

इस पाठ का सारांश निम्नलिखित है: इस ग्रंथ में महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित 'योगवासिष्ठ' का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है, जिसमें विशेष रूप से वैराग्य के विषय पर चर्चा की गई है। पाठ की शुरुआत में संसार की दुखद स्थितियों का वर्णन किया गया है, जिसमें जन्म, जरा, व्याधि, मृत्यु, हर्ष, शोक और क्रोध जैसे दुखों का उल्लेख है। इन सभी दुखों से ग्रसित मानवता को शिक्षित करने के लिए भगवान श्रीब्रह्मदेव के आदेश पर महर्षि वाल्मीकि ने इस ग्रंथ की रचना की। महासमुद्र के समान आनंदस्वरूप परमात्मा का प्रणाम करते हुए, ग्रंथ के मुख्य विषय को स्पष्ट किया गया है। इसके पश्चात, ब्राह्मण सुतीक्ष्ण द्वारा ज्ञान और कर्म के संबंध में प्रश्न पूछे जाते हैं। वे यह जानना चाहते हैं कि मोक्ष का साधन क्या है - कर्म, ज्ञान, या दोनों। अगस्त्य मुनि इस प्रश्न का उत्तर देते हैं कि ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होते हैं। मुनि ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल कर्म या केवल ज्ञान से मोक्ष नहीं मिलता, बल्कि दोनों के समुच्चय से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके बाद, एक प्राचीन कथा के माध्यम से कर्म और ज्ञान के महत्व को समझाया गया है, जिसमें राजा अरिष्टनेमि का तप और स्वर्ग की प्राप्ति की कहानी है। कुल मिलाकर, यह पाठ ज्ञान और कर्म के संतुलन पर आधारित है, जो जीवन में मोक्ष की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।


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