श्रीज्ञानसागरकी | Shree Gyansagarki

- श्रेणी: चौपाया और छंद / chaupaya and chhnad दोहे /dohas साहित्य / Literature
- लेखक: कबीरदास - Kabirdas
- पृष्ठ : 112
- साइज: 6 MB
- वर्ष: 1906
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दो शब्द :
यह पाठ "ज्ञानसागर" नामक एक धार्मिक ग्रंथ का हिस्सा है, जिसमें भक्ति, ज्ञान और संत परंपरा के विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया गया है। इसमें संत कबीर के विचार, उनके उपदेश और भक्ति का महत्व दर्शाया गया है। कबीर ने अपने समय में सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और सत्य, प्रेम और भक्ति पर जोर दिया। पाठ में विभिन्न धार्मिक कथाएँ, चरित्र और उपदेश दिए गए हैं, जिनमें भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जाती है। संतों के जीवन और उनके अनुभवों के माध्यम से यह बताया गया है कि कैसे नाम जपने और सच्चे गुरु की शरण में जाने से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। यह ग्रंथ ज्ञान और भक्ति का एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है, जिसमें आत्मा की उन्नति और समाज के प्रति दायित्व का बोध कराया गया है। ग्रंथ में विभिन्न देवताओं, उनके स्वरूपों और उनके भक्तों का भी उल्लेख है, जो श्रद्धा और आस्था के प्रतीक हैं। पाठ का उद्देश्य मानवता के कल्याण के लिए सही मार्ग दिखाना और भक्ति की शक्ति को उजागर करना है, ताकि हर व्यक्ति अपने जीवन में सच्चाई और प्रेम को अपनाए। इस प्रकार, "ज्ञानसागर" एक महत्वपूर्ण धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रंथ है, जो जीवन के गूढ़ रहस्यों और भक्ति के माध्यम से आत्मज्ञान की ओर ले जाने का प्रयास करता है।
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