त्याग-पत्र | Tyag Patra

By: जैनेन्द्र कुमार - Jainendra Kumar


दो शब्द :

"त्याग-पत्र" एक मौलिक सामाजिक उपन्यास है, जिसमें एक जज की भावनात्मक यात्रा का वर्णन है। कहानी की शुरुआत सर एम. दयाल के निधन की खबर से होती है, जो पहले एक चीफ जज थे और बाद में हरिद्वार में विरक्त जीवन बिताने लगे थे। उनके निधन के बाद उनके कागजातों में एक पांडुलिपि पाई जाती है, जिसका सारांश प्रस्तुत किया गया है। कहानी में मुख्य पात्र प्रमोद है, जो अपने परिवार और खासकर अपनी बुआ के साथ बिताए गए बचपन के दिनों की यादों में खोया रहता है। प्रमोद और उसकी बुआ के बीच का रिश्ता बहुत गहरा और संवेदनशील है। बुआ एक सुंदर और बुद्धिमान महिला हैं, जो प्रमोद के लिए आदर्श की तरह हैं। वह उसे शिक्षा और नैतिकता के उपदेश देती हैं और उसकी जिंदगी में एक स्थिरता लाती हैं। प्रमोद अपनी बुआ के प्रति गहरी भावनाएँ रखता है और उनके साथ बिताए क्षणों को ताजगी से याद करता है। कहानी में प्रमोद की बुआ की शिक्षा, उनकी मस्ती और उनके साथ बिताए खुशनुमा क्षणों का चित्रण किया गया है। बुआ के प्रति प्रमोद की भावना समय के साथ बदलती है, और वह इस बदलाव को महसूस करता है। बुआ का अपने जीवन के प्रति दृष्टिकोण और प्रमोद के साथ उनका रिश्ता कहानी का मुख्य आकर्षण है। बुआ की मासूमियत, उनके सपने और उनकी आकांक्षाएँ प्रमोद के मन में गहरी छाप छोड़ती हैं। कहानी का अंत बुआ की चिड़िया बनने की इच्छा और प्रमोद के साथ उसकी भावनात्मक बंधन को दर्शाता है, जो इसे एक हृदयस्पर्शी और संवेदनशील कथा बनाता है। पूरे पाठ में परिवार, प्यार, त्याग और संबंधों की गहराई को बखूबी उजागर किया गया है।


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