तंत्रसार | Tantra Saar

- श्रेणी: ग्रन्थ / granth संस्कृत /sanskrit
- लेखक: अभिनव गुप्ता - Abhinav Gupta
- पृष्ठ : 248
- साइज: 14 MB
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दो शब्द :
इस पाठ का सारांश इस प्रकार है: यह पाठ "तंत्रसार" नामक एक महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ का परिचय देता है, जिसे अभिनव गुप्त ने लिखा है। इस ग्रंथ को महामहोपाध्याय पंडित मुकुंद राम शास्त्री द्वारा संपादित किया गया है। प्रस्तावना में लेखक ने उन सभी व्यक्तियों का आभार व्यक्त किया है जिन्होंने इस ग्रंथ के पांडुलिपियों को उपलब्ध कराया। तीन महत्वपूर्ण पांडुलिपियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें से पहली कश्मीरी कागज पर लिखी गई है और इसमें कुछ गलतियाँ और चूक हैं। दूसरी पांडुलिपि देवनागरी लिपि में है, लेकिन यह भी गलतियों से भरी हुई है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण पांडुलिपि 1527 ईस्वी की है, जो बहुत पुरानी है और इसमें सही जानकारी और टिप्पणी भी शामिल है। इस ग्रंथ का मुख्य विषय आत्मा का सर्वोच्च आत्मा या भगवान के साथ संबंध है। लेखक के अनुसार, व्यक्तिगत आत्मा सर्वोच्च आत्मा से भिन्न नहीं है, बल्कि यह अज्ञान के आवरण से ढकी हुई है। यह अज्ञान तीन प्रकार के दोषों से उत्पन्न होती है: अनव, माय और कर्म। आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है, जो कि अगम शास्त्रों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। इस ज्ञान के साथ ही आत्मा के ऊपर लगे दोषों का नाश होता है। शैवागम, जो अगम शास्त्रों में आता है, उस ज्ञान की ओर ले जाने का एक सरल मार्ग है, जो कि व्यक्त आत्मा और सर्वोच्च आत्मा के बीच का संबंध स्थापित करता है। अभिनव गुप्त का योगदान इस दार्शनिक प्रणाली को विकसित करने में महत्वपूर्ण है, और उन्हें इस प्रणाली के महान व्याख्याता के रूप में माना जाता है।
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