सूरज का सातवाँ घोड़ा | Suraj ka Satwa Godha

By: धर्मवीर भारती - Dharmvir Bharati
सूरज का सातवाँ घोड़ा  | Suraj ka Satwa Godha by


दो शब्द :

"सूरज का सातवाँ घोड़ा" उपन्यास धर्मवीर भारती की एक महत्वपूर्ण कृति है, जो हिंदी साहित्य में नई पहचान बनाती है। इस उपन्यास की भूमिका में लेखक ने अपने समकालीन लेखकों के प्रति अपनी राय व्यक्त करते हुए भारती की प्रतिभा को सराहा है। वे इसे हिंदी साहित्य का उज्ज्वल भविष्य मानते हैं और भारती की मौलिकता, श्रम, और हास्य की विशेषताओं का उल्लेख करते हैं। उपन्यास का कथानक एक पूरे समाज का चित्रण और आलोचना करता है। इसमें कई कहानियाँ एकीकृत होकर एक प्रमुख कहानी का निर्माण करती हैं। भारती ने एक पुरानी कहानी कहने की शैली का उपयोग किया है, जिससे पाठक को उनकी बातों के प्रति एक खुलापन अनुभव हो। उपन्यास का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह पाठकों को गहन विचारों की ओर ले जाने का प्रयास करता है। लेखक ने इस कृति के माध्यम से समाज की कठिनाइयों और संघर्षों को उजागर किया है। उपन्यास में हास्य और आशा का एक अद्भुत संयोग है, जो पाठकों को जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण देता है। भारती का विश्वास है कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की ताकत हमेशा मौजूद रहती है। इस उपन्यास में मार्क्सवाद का संदर्भ भी है, जिसे लेखक ने अपने दृष्टिकोण में शामिल किया है। वे मार्क्सवाद के अध्ययन से मिली शांति और बल को स्वीकारते हैं, साथ ही साहित्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी महसूस करते हैं। अंत में, लेखक पाठकों से संवाद करते हुए अपनी रचनाओं के पीछे के उद्देश्य और अनुभव साझा करते हैं, यह बताते हुए कि उनका लेखन समाज की समस्याओं को उजागर करने और एक नई चेतना जगाने का प्रयास है। "सूरज का सातवाँ घोड़ा" केवल एक कहानी नहीं, बल्कि यह जीवन की जटिलताओं और संभावनाओं का एक गहन अध्ययन है।


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