भार्तिहरी शतक | Bhartihari Shatak

- श्रेणी: Hindu Scriptures | हिंदू धर्मग्रंथ ग्रन्थ / granth संस्कृत /sanskrit साहित्य / Literature
- लेखक: भर्तृहरि - Bhartrahari
- पृष्ठ : 114
- साइज: 15 MB
- वर्ष: 1926
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दो शब्द :
इस पाठ में विद्या, नीतियों और मानव आचरण पर विचार किया गया है। इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि विद्या ही मनुष्य की वास्तविक शोभा है और यह न केवल सामाजिक मान-सम्मान का आधार है, बल्कि जीवन के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को भी समृद्ध करती है। विद्या के अभाव में मनुष्य पशु के समान होता है। पाठ में यह भी कहा गया है कि सच्चे गुण, जैसे दया, क्षमा, उदारता और सत्यता, व्यक्ति के चरित्र को मजबूत बनाते हैं। अच्छे आचरण का पालन करने वाले व्यक्ति को समाज में सम्मान मिलता है और उनकी प्रतिष्ठा बनी रहती है। इसके अलावा, संतोष और सच्ची मित्रता के महत्व को भी रेखांकित किया गया है, जो जीवन में सच्चे सुख का आधार हैं। आगे चलकर, पाठ में यह बताया गया है कि विपत्ति के समय में भी श्रेष्ठ लोग अपने कर्तव्यों को नहीं छोड़ते। वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हैं और किसी भी परिस्थिति में अपने आचरण को नहीं बदलते। अंत में, यह स्पष्ट किया गया है कि धन और सामाजिक स्थिति का मूल्य केवल तब तक है जब तक व्यक्ति में अच्छे गुण और विद्या का समावेश है। विद्या ही सच्चा धन है, और जो व्यक्ति विद्या के मार्ग पर चलता है, वही सच्चे सुख का अनुभव कर सकता है। इस प्रकार, पाठ में ज्ञान, नीतियों और मानवता के मूल्यों पर गहन विचार किया गया है, जो जीवन को सार्थक बनाने में सहायक होते हैं।
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