योग दर्शन | Yoga Darshan

- श्रेणी: योग / Yoga साहित्य / Literature
- लेखक: हरिकृष्णदास गोयन्दका - Harikrishnadas Goyndka
- पृष्ठ : 194
- साइज: 6 MB
- वर्ष: 1940
-
-
Share Now:
दो शब्द :
यह पाठ पतंजलि के योग दर्शन का सारांश प्रस्तुत करता है, जिसमें योग के विभिन्न पहलुओं और उसके सिद्धांतों का विवरण है। पाठ की शुरुआत में पतंजलि को प्रणाम करते हुए उनकी शिक्षाओं का उल्लेख किया गया है, जिनमें योग, व्याकरण और चिकित्सा के तत्व शामिल हैं। इसमें चार प्रमुख पादों का वर्णन है: पहले पाद में योग के लक्षण, चित्त की वृत्तियों के विभिन्न भेद, और उनके निरोध के उपायों का वर्णन किया गया है। चित्त की वृत्तियों का निद्रा और मिथ्याज्ञान के संदर्भ में विश्लेषण किया गया है। दूसरे पाद में दुःख के कारणों, जिन्हें 'क्लेश' कहा गया है, का उल्लेख किया गया है। इसमें अविद्या, आसक्ति, और अन्य क्लेशों को समाप्त करने के उपाय बताए गए हैं। तीसरे पाद में ध्यान, धारणा, और समाधि के स्वरूप और महत्व पर चर्चा की गई है। इसमें योगी की सिद्धियों और उनके उपयोग के प्रति चेतावनी दी गई है, ताकि यथार्थ में केवल्य की प्राप्ति पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। चौथे पाद में कैवल्य की स्थिति का वर्णन है, जिसमें आत्मा की मुक्ति और उसके वास्तविक स्वरूप की पहचान की जाती है। इस पाठ में यह स्पष्ट किया गया है कि योग का अभ्यास कैसे आत्मकल्याण की ओर ले जाता है, और साधक को अपने मन के विचारों और वृत्तियों पर नियंत्रण पाने के लिए क्या उपाय करने चाहिए। योग दर्शन को सरलता से समझाने और आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए इसका अध्ययन आवश्यक है। पाठक को यह सलाह दी गई है कि वह योग के गहरे रहस्यों को समझने के लिए इसे ध्यानपूर्वक पढ़ें और विचार करें।
Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.