शाकुन्तल | Shakuntal

By: मोहन राकेश - Mohan Rakesh
शाकुन्तल | Shakuntal by


दो शब्द :

इस पाठ में मोहन राकेश ने संस्कृत नाटक और विशेष रूप से कालिदास के नाटक "अभिज्ञान शाकुन्तल" के अनुवाद और मंचन के अनुभवों को साझा किया है। राकेश ने बताया है कि संस्कृत नाटक पढ़ने का उनका पहला अनुभव भास के "प्रांतमा" नाटक से शुरू हुआ था, लेकिन प्रारंभिक शब्दों के अर्थों को समझने में उन्हें कठिनाई हुई। उन्होंने यह भी महसूस किया कि संस्कृत की संरचना और अभिव्यक्ति आज की भाषाओं से कितनी भिन्न है, जिससे अनुवाद करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। विभाजन से पहले, उन्होंने लाहौर में संस्कृत नाटकों का मंचन किया था, जो उनके लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव था। राकेश ने यह भी बताया कि भास के नाटकों का अनुवाद करना उनकी प्राथमिकता थी, लेकिन उन्हें मूल का अनुवाद करते समय कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने "मृच्छकटिक" नाटक का मंचन देखकर फिर से अनुवाद करने का उत्साह पाया। राकेश ने अपने अनुवाद में मूल भाव और अर्थ को सुरक्षित रखने की कोशिश की, लेकिन कुछ स्थानों पर उन्हें थोड़ी स्वतंत्रता लेनी पड़ी। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हर पीढ़ी के बाद नाटकों के नए अनुवाद की आवश्यकता होती है। अंत में, उन्होंने यह संकेत दिया कि उनके अनुवाद आज की भाषा और संवेदनाओं के अनुरूप हैं, और भविष्य में भी इनका स्थान अन्य अनुवादों द्वारा लिया जाएगा। इस प्रकार, पाठ में राकेश का अनुवादक के रूप में संघर्ष, नाटकीय भाषा की चुनौती और संस्कृत नाटकों के प्रति उनकी रुचि का विवरण मिलता है।


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