जातिभेद का उच्छेद | Jaatibhed Kaa Uchchhed

By: डॉ भीमराओ रामजी अम्बेडकर - Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar


दो शब्द :

इस पाठ में डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा जाति-भेद के उच्छेद की आवश्यकता और उसकी जटिलताओं पर चर्चा की गई है। आम्बेडकर ने अपने अछूत भाइयों को यह सलाह दी थी कि वे हिन्दू समाज को छोड़कर किसी अन्य धर्म की शरण लें, जिससे उनकी भलाई संभव हो सके। इस संदर्भ में, जाति-भेद को समाप्त करने के लिए सामाजिक सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। पाठ में बताया गया है कि भारत में समाज सुधारकों की संख्या कम है, जबकि आलोचकों की संख्या अधिक है। राजनीतिक सुधार और सामाजिक सुधार के बीच विवाद हुआ है, जहाँ कुछ लोगों का मानना है कि राजनीतिक सुधार पहले होना चाहिए, जबकि अन्य का तर्क है कि सामाजिक सुधार आवश्यक है। अम्बेडकर ने ऐतिहासिक उदाहरणों के माध्यम से जाति-भेद की कुप्रथाओं का वर्णन किया है, जैसे कि अछूतों के प्रति सवर्णों का व्यवहार, उनकी सामाजिक स्थिति और अधिकारों का उल्लंघन। उन्होंने उदाहरण दिए हैं कि किस तरह अछूतों को अपमानित किया गया, उनके अधिकारों का हनन किया गया और उन्हें समाज में नीचा दिखाया गया। इस प्रकार, पाठ सामाजिक सुधार की आवश्यकता को उजागर करता है और जाति-भेद को समाप्त करने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग करता है। आम्बेडकर का यह दृष्टिकोण हिन्दू समाज के भीतर व्याप्त गहरी कुरीतियों को चुनौती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।


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