ब्रह्मचर्य साधन | Brahmacharya Sadhna

- श्रेणी: जीवनी / Biography ज्ञान विधा / gyan vidhya ब्रह्मचर्य/ Brahmcharya
- लेखक: श्रीदुलारेलाल भार्गव - Shridularelal Bhargav
- पृष्ठ : 138
- साइज: 4 MB
- वर्ष: 1989
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दो शब्द :
इस पाठ का सारांश इस प्रकार है: पुस्तक "ब्रह्मचर्य-साधन" में ब्रह्मचर्य के महत्व और इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। ब्रह्मचर्य एक प्राचीन भारतीय अवधारणा है, जो केवल वीर्य-रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तीन प्रमुख अर्थ हैं: वेद, ज्ञान, और परमात्मा का आचरण। ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए संयम की आवश्यकता होती है, जो केवल इंद्रियों पर नियंत्रण से संभव है। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों का पालन करने से व्यक्ति मानसिक और आध्यात्मिक रूप से प्रगति कर सकता है। इसके लिए यम (नैतिक अनुशासन) और नियम (व्यक्तिगत अनुशासन) का पालन करना आवश्यक है। यम में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह शामिल हैं, जबकि नियम में शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान शामिल हैं। ब्रह्मचर्य की साधना के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखे, वेदों का अध्ययन करे, और परमात्मा का ध्यान करे। इस प्रकार, ब्रह्मचर्य न केवल व्यक्तिगत जीवन को सुधारता है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। अंत में, पुस्तक का संदेश है कि यदि भारत को फिर से एक महान राष्ट्र बनाना है, तो ब्रह्मचर्य-साधन को अपनाना होगा, जिससे व्यक्तियों और समाज का विकास संभव हो सके।
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