दो शब्द :

कबीरदास पर यह पाठ उनकी साहित्यिक और दार्शनिक विचारों की आलोचना पर आधारित है। लेखक पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर के विचारों और साधनाओं का गहन विश्लेषण किया है। कबीर का साहित्य सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं पर कटाक्ष करता है, जिसमें उन्होंने नाथपंथियों और योगियों की साधनाओं की आलोचना की है। लेखक ने कबीर की सहज समाधि की धारणा का भी उल्लेख किया है, जिसे उन्होंने योगमार्ग से असम्बद्ध बताया है। पुस्तक में कबीर की साखियों और पदों का संकलन भी किया गया है, जिनका उपयोग कबीर के विचारों को समझने में सहायक होता है। लेखक ने कबीर के दृष्टिकोण को स्पष्ट करने का प्रयास किया है और यह बताने की कोशिश की है कि कबीर ने किस प्रकार परंपरागत धार्मिक प्रथाओं को चुनौती दी। कबीर का संदेश सरलता और सत्य की खोज पर केंद्रित है, जिसमें उन्होंने ज्ञान और प्रेम को सबसे महत्वपूर्ण माना है। लेखक ने कबीर के विचारों के ऐतिहासिक विकास और उनके समय की धार्मिक परिस्थितियों पर भी चर्चा की है। इस पाठ का उद्देश्य कबीर के विचारों को गहराई से समझना और उनके साहित्य की महत्ता को उजागर करना है। लेखक ने कबीर की आलोचना के साथ-साथ उनके प्रति अपनी श्रद्धा भी व्यक्त की है, और जिस प्रकार कबीर ने अपने समय की बुराइयों को उजागर किया, उसे सराहा है। इस प्रकार, यह पाठ कबीर के जीवन, उनके विचारों और उनकी साहित्यिक धारा का एक समग्र चित्र प्रस्तुत करता है।


Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *