दो शब्द :

इस पाठ में "हरिवंशपुराण" का सम्पादन और उसके विभिन्न संस्करणों के बारे में जानकारी दी गई है। सम्पादक ने विभिन्न प्राचीन प्रतियों का उल्लेख करते हुए बताया है कि इनमें से कुछ प्रतियाँ जर्जर हो चुकी हैं, जबकि अन्य की स्थिति अच्छी है। हरिवंशपुराण की रचना आचार्य जिनसेन ने की थी, जो दिगम्बर जैन परंपरा के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। पाठ में यह भी बताया गया है कि हरिवंशपुराण का आधार कुछ अन्य प्राचीन ग्रंथों पर निर्भर है, और आचार्य जिनसेन ने अपने समय की आचार्य परंपरा का विस्तृत विवरण दिया है। जिनसेन का जन्म स्थान और प्रारंभिक जीवन का विवरण उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनकी विद्या और ग्रंथों में गहनता स्पष्ट है। हरिवंशपुराण की रचना की समयावधि और स्थान के बारे में भी जानकारी दी गई है, जिसमें वर्धमानपुर और दोस्तटिका का उल्लेख है। पाठ में जिनसेन की गुरु परंपरा का भी विस्तार से वर्णन किया गया है, जिससे उनके ग्रंथ की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्वता सिद्ध होती है। कुल मिलाकर, यह पाठ हरिवंशपुराण के सम्पादन, उसकी रचना, और उसके सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व को स्पष्ट करता है।


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