हरिवंश पुराण | Harivansh puran

- श्रेणी: Hindu Scriptures | हिंदू धर्मग्रंथ धार्मिक / Religious हिंदू - Hinduism
- लेखक: गजाधर लाल - Gjadhar Lal
- पृष्ठ : 647
- साइज: 43 MB
- वर्ष: 1916
-
-
Share Now:
दो शब्द :
इस पाठ की प्रस्तावना में बताया गया है कि मानव के विचार समय के साथ बदलते रहते हैं। यह परिवर्तन इस हद तक होता है कि जो विचार पहले थे, वे वर्तमान में नहीं होते और भविष्य में भी बदलते रहेंगे। पहले, लोग किसी भी विषय पर गहराई से ज्ञान रखते थे और तर्क वितर्क करते थे, लेकिन समय के साथ-साथ बुद्धि में कमी आई और फिर पुराणों का निर्माण हुआ, जिससे धर्म का पालन करने में मदद मिली। पुराणों को केवल गप्प मानना गलत है, क्योंकि ये हमारे इतिहास को दर्शाते हैं और हमारे पूर्वजों के पवित्र चरित्र के माध्यम से हमें प्रेरणा देते हैं। पाठ में यह भी कहा गया है कि सभी जीवों की कामना मोक्ष की होती है, जिसे भेदविज्ञान से प्राप्त किया जा सकता है। पुराण भेदविज्ञान का आधार होते हैं, क्योंकि ये महापुरुषों के चरित्रों के माध्यम से हमारे हृदय में जोश और प्रेरणा भरते हैं। यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि हम केवल अपने अनुभवों पर भरोसा करें और अन्य विचारों को न मानें, तो यह उचित नहीं होगा। पाठ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि विद्वानों को किसी भी ग्रंथ की आलोचना करते समय उसके सभी पहलुओं का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना चाहिए। यदि किसी विद्वान के विचार में कोई दोष हो, तो उसे सम्पूर्ण ग्रंथ के मूल्यांकन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। पाठ में यह भी बताया गया है कि हरिवंशपुराण के लेखक आचार्य जिनसेन की विद्वत्ता और उनके ग्रंथ की विशेषताएँ हैं, जो इसे अन्य ग्रंथों से अलग बनाती हैं। अंत में, पाठ में इस ग्रंथ के प्रकाशन में सहायक व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है और यह अनुरोध किया गया है कि जैन धर्म के प्रचार और संरक्षण के लिए इस प्रकार के ग्रंथों का प्रकाशन जारी रहना चाहिए।
Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.