जाग्रति का सन्देश | Jagriti ka Sandesh

- श्रेणी: Speech and Updesh | भाषण और उपदेश Vedanta and Spirituality | वेदांत और आध्यात्मिकता ज्ञान विधा / gyan vidhya साधना /sadhana
- लेखक: गणेश पांडेय - Ganesh Pandey स्वामी विवेकानंद - Swami Vivekanand
- पृष्ठ : 198
- साइज: 7 MB
- वर्ष: 1939
-
-
Share Now:
दो शब्द :
इस पाठ में स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं को प्रेरित करने और जागरूक करने का संदेश दिया है। वे नास्तिकता की तुलना में कुसंस्कारों से मुक्त मस्तिष्क को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि युवा व्यक्तियों में साहस, ऊर्जा और दृढ़ता होनी चाहिए, और उन्हें नकारात्मक भावनाओं से दूर रहना चाहिए। विवेकानन्द ने यह भी बताया कि मनुष्य को आत्मिक मुक्ति की तलाश में संसार की माया को त्यागना चाहिए, लेकिन इस प्रक्रिया में वह अपने संबंधों को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने अपनी मातृभूमि भारत के प्रति अपने प्रेम और कृतज्ञता का इज़हार किया और बताया कि पाश्चात्य देशों की यात्रा के बाद भारत की संस्कृति और धरती उनके लिए कितनी प्रिय हो गई है। इसके अलावा, विवेकानन्द ने शिकागो धर्म महासभा की चर्चा की, जिसमें उन्होंने देखा कि पश्चिमी देशों में भारत की आध्यात्मिकता और संस्कृति को लेकर कई misconceptions हैं। उन्होंने कहा कि भारत की दरिद्रता और पाप को समझने के लिए विदेशी लोगों को गहराई से अध्ययन करने की आवश्यकता है। वे ब्रिटिश और अमेरिकन जातियों के प्रति अपने अनुभव साझा करते हैं, जिसमें उन्होंने बताया कि प्रारंभ में उनके प्रति घृणा का भाव था, लेकिन निकटता के बाद उन्होंने पाया कि उनमें गहरी मानवता और मित्रता है। विवेकानन्द ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी यात्रा का उद्देश्य केवल धर्म प्रचार नहीं था, बल्कि मानवता के बीच एकता और प्रेम का संदेश फैलाना था। अंत में, उनका संदेश यह है कि हमें एक दूसरे की भलाई के लिए प्रयास करना चाहिए और अपने हृदय की गहराइयों में छिपी भावनाओं को प्रकट करना चाहिए। वे यह मानते हैं कि अगर हम एक-दूसरे को समझें और मिलकर चलें, तो ही हम सच्चे मित्र बन सकते हैं।
Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.