सांख्यकारिका | Samhaykarika

- श्रेणी: ज्योतिष / Astrology पाठ्यपुस्तक / Textbook भारत / India साहित्य / Literature
- लेखक: श्री ईश्वरकृष्ण - Shri Isvarakrsna
- पृष्ठ : 144
- साइज: 3 MB
- वर्ष: 1900
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दो शब्द :
इस पाठ में भारतीय दर्शन के विभिन्न धाराओं और उनके वर्गीकरण का वर्णन किया गया है। दर्शन को दो मुख्य धाराओं में बांटा गया है: आस्तिक और नास्तिक। आस्तिक दर्शन में न्याय, बैशेषिक, वेदांत, मीमांसा, सांख्य और योग शामिल हैं, जबकि नास्तिक दर्शन में जैन, सार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौतान्तिक और बैभाषिक जैसे दृष्टिकोण शामिल हैं। दर्शन शब्द का अर्थ है विचार करना या किसी वस्तु का तात्त्विक स्वरूप जानना। यह शास्त्र के रूप में स्थापित है, जिसमें सत्य की खोज की जाती है। सांख्य दर्शन को एक पुरातन दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसका प्रणेता महामुनि कपिल है। सांख्य दर्शन में तत्वों की संख्या 25 बताई गई है और इसमें प्रकृति और पुरुष का भेद ज्ञान की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यह पाठ यह भी बताता है कि सांख्य दर्शन में कार्य और कारण की त्रिगुणात्मकता का स्वीकार किया गया है और इसके सिद्धांत उपनिषदों, पुराणों और विभिन्न ग्रंथों में उल्लिखित हैं। पाठ का अंत कार्य और कारण के संबंध में विभिन्न विचारों का उल्लेख करते हुए किया गया है, जिसमें बौद्ध दृष्टिकोण और वेदांतियों के विचार भी शामिल हैं। इस प्रकार, पाठ में दर्शन के विभिन्न पहलुओं, उनके महत्व और सिद्धांतों का समावेश किया गया है।
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