नीति शतक | Niti Shatak

- श्रेणी: Hindu Scriptures | हिंदू धर्मग्रंथ कहानियाँ / Stories काव्य / Poetry संस्कृत /sanskrit
- लेखक: बाबू हरिदास वैध - Babu Haridas Vaidhya भर्तृहरि - Bhartrahari
- पृष्ठ : 578
- साइज: 14 MB
- वर्ष: 1939
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दो शब्द :
इस पाठ में भतृहरि की नीति-शतक से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण विचारों का संक्षेप में वर्णन किया गया है। इसमें दुर्योधन के पांडवों के प्रति अन्याय और अनीति का उल्लेख किया गया है, जिसमें विदुर, भीष्म और सज्ध्य प्रश्नति जैसे सच्चे शुभचिंतकों ने उसे समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह अपनी मूर्खता में अड़ा रहा। भतृहरि का यह विचार है कि मूर्ख व्यक्ति अपनी धारणाओं पर अडिग रहता है और किसी भी प्रकार के उपदेश को नहीं सुनता। पाठ में यह भी कहा गया है कि ज्ञान रखने वाला व्यक्ति हमेशा अपने ज्ञान को सीमित मानता है, जबकि मूर्ख व्यक्ति अपने ज्ञान का अहंकार करता है। ज्ञान और विवेक की महत्ता को रेखांकित करते हुए बताया गया है कि विवेक का पतन व्यक्ति को नीचे गिराता है, जैसे गंगा का नीच स्तर पर गिरना। अंत में यह बताया गया है कि जो लोग अपनी गलतियों को नहीं समझते और बुरे कार्यों में लिप्त रहते हैं, उनका पतन निश्चित होता है। पाठ में यह संदेश दिया गया है कि विवेक का उपयोग न करने वालों का अंत दुखदाई होता है और वे समाज में नीचता को अपनाते हैं। भतृहरि के अनुसार, मानव जीवन में विवेक और सही मार्गदर्शन आवश्यक हैं, अन्यथा पतन अवश्यंभावी है।
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