शरत्‌ रचनावली भाग-३ | Sharat Rachnavali part -3

By: सुशील त्रिवेदी - Sushil Trivedi
शरत्‌ रचनावली भाग-३  | Sharat Rachnavali part -3 by


दो शब्द :

शरत् चंद्र चट्टोपाध्याय एक प्रमुख बांग्ला साहित्यकार थे, जिनका जन्म 5 सितंबर 1876 को हुगली जिले के देवानन्दपुर गांव में हुआ। उन्हें अपने समय में बंगाल में बड़ी प्रतिष्ठा मिली और बाद में उनकी रचनाएँ हिंदी सहित अन्य भाषाओं में भी प्रसिद्ध हुईं। उनके साहित्य में ग्रामीण जीवन, सामाजिक समस्याएँ, और नारी संवेदना की गहरी छाप है। शरत् का जीवन संघर्षपूर्ण था, जिसमें उन्होंने अपने अनुभवों को साहित्य में बखूबी उतारा। उनके पात्र और कहानियाँ आज भी प्रासंगिक हैं, जो कि पिछले सौ वर्षों के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों को दर्शाते हैं। शरत् चंद्र ने अपने लेखन में समाज की रूढ़िवादिता और अन्य विसंगतियों पर सवाल उठाए और उन्होंने नारी के अधिकारों के प्रति सहानुभूति दिखाई। उनकी रचनाएँ जैसे "देवदास", "बड़ी दीदी", और "चरित्रहीन" ने उन्हें साहित्य जगत में विशेष पहचान दिलाई। शरत् चंद्र का लेखन एक रोमानी दृष्टिकोण से भरा हुआ है, जिसमें उन्होंने न केवल सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया, बल्कि अपनी संवेदनाओं का भी समावेश किया। उनकी रचनाओं में बंकिम चंद्र और रवींद्रनाथ ठाकुर का प्रभाव भी देखा जा सकता है। वे अपनी रचनाओं में व्यक्तिगत अनुभवों को शामिल करते थे, जिससे उनकी कहानियाँ और उपन्यास जीवंत हो उठते थे। शरत् चंद्र ने अपने जीवन के अंत में भी रचनाएँ कीं, लेकिन उन्होंने अपने कुछ कार्यों को जीते जी प्रकाशित नहीं होने दिया। उनकी रचनाएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि उनके ऊपर फिल्में और धारावाहिक भी बने हैं, जो उनकी लोकप्रियता को दर्शाते हैं। शरत् चंद्र का योगदान भारतीय साहित्य में अमूल्य है, और उनकी रचनाएँ आज भी पाठकों को आकर्षित करती हैं।


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