दो शब्द :

यह पाठ महाभारत के वनपर्व का एक अंश है, जिसमें पाण्डवों के वनवास के समय की कठिनाइयों और उनके आचार-विचार का वर्णन किया गया है। जनमेजय नामक राजा ने महर्षि व्यास से पूछा कि जब कौरवों ने पाण्डवों को जुए में हराया और उन्हें अपमानित किया, तब पाण्डवों ने क्या किया। इस पर व्यास ने बताया कि पाण्डव क्रोधित होकर हस्तिनापुर से बाहर निकल गए और वन की ओर चले गए। पाठ में पाण्डवों और द्रौपदी के वनवास के दौरान के अनुभवों का वर्णन है। पाण्डवों ने वन में रहने के दौरान क्या आचार-व्यवहार रखा, क्या खाया और कहाँ रहे, इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने की इच्छा जनमेजय ने जताई। व्यास ने बताया कि दुर्योधन, जो पापी और अधर्मी है, के शासन में लोग दुखी हैं और वे पाण्डवों के साथ जाना चाहते हैं। पाण्डवों के प्रति लोगों का प्रेम और उनकी आदर्शता का भी उल्लेख किया गया है। इसके अलावा, पाठ में यह भी बताया गया है कि पाण्डवों के संग रहने से व्यक्ति में गुण और धर्म का विकास होता है। साधु और धर्मात्माओं का संग करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है, जबकि दुष्टों के संग रहने से पतन होता है। इस प्रकार, पाठ में पाण्डवों के वनवास के दौरान की घटनाएं, उनके आचार-विचार और उनके प्रति लोगों की भावना का सारांश प्रस्तुत किया गया है।


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