भारतीय चित्रकला (१९६३) एक ४६२० | Bharatiya Chitrakala (1963) Ac 4620

By: वाचस्पति गैरोला - Vachaspati Gairola
भारतीय चित्रकला (१९६३) एक ४६२० | Bharatiya Chitrakala (1963) Ac 4620 by


दो शब्द :

इस पाठ में भारतीय चित्रकला के विकास और महत्व पर चर्चा की गई है। लेखक ने प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक की चित्रकला की परंपरा का अवलोकन किया है। उन्होंने चित्रकला के शास्त्रीय पक्ष, उसकी विभिन्न धाराओं और उसके विकास के क्रम को समझाने का प्रयास किया है। पाठ में यह बताया गया है कि कला और शिल्प में क्या भेद है और चित्रकला का स्थान अन्य कलाओं की तुलना में क्या है। संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह बिना किसी भौतिक माध्यम के भी अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकता है, जबकि चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला को अपने अभिव्यक्ति के लिए भौतिक माध्यमों की आवश्यकता होती है। लेखक ने यह भी बताया है कि कला और सौंदर्य का संबंध गहरा है, लेकिन दोनों समानार्थी नहीं हैं। कला का उद्देश्य आनंद की सृष्टि है, और सभी कलाएँ अपने तरीके से इस आनंद को उत्पन्न करती हैं। चित्रकला में रेखा, आकार, रिक्तता, प्रकाश, छाया और रंग जैसे तत्वों का समन्वय किया जाता है, जो चित्र की रचना में महत्वपूर्ण होते हैं। भारतीय दृष्टिकोण से चित्रकला के कई तत्वों का उल्लेख किया गया है, जैसे रूप, प्रमाण, भाव, लावण्य, सादुश्य और वर्णिका-भंग। इन तत्वों के सफल संयोजन से चित्रकला की उत्कृष्टता प्रकट होती है। आधुनिक युग में चित्रकला की परंपरा को पुनर्जीवित करने का उल्लेख किया गया है, जिसमें पश्चिमी प्रभावों ने इसे एक नई दिशा दी। इस प्रकार, लेखक ने भारतीय चित्रकला की समृद्धि, उसकी विविधता और सामाजिक संदर्भ में उसके विकास पर प्रकाश डाला है।


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