वर्त्तमान भारत | Bartaman Bharat

- श्रेणी: इतिहास / History दार्शनिक, तत्त्वज्ञान और नीति | Philosophy हिंदू - Hinduism
- लेखक: स्वामी विवेकानंद - Swami Vivekanand
- पृष्ठ : 74
- साइज: 1 MB
- वर्ष: 1951
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दो शब्द :
इस पाठ में स्वामी विवेकानंद द्वारा भारत के प्राचीन गौरव और राष्ट्र की अवनति के कारणों का उल्लेख किया गया है। स्वामी विवेकानंद ने यह बताया है कि यदि भारत को पुनः अपने गौरव को प्राप्त करना है, तो नागरिकों को निःस्वार्थ सेवा और आदर्श चारित्र्य अपनाना होगा। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय ध्येयों की विवेचना की है और यह भी कहा है कि समाज में शक्ति और संगठन की आवश्यकता है। पुस्तक में वेदों के समय के पुरोहितों और उनके महत्व का भी वर्णन है, जिसमें यह बताया गया है कि राजा और प्रजा दोनों पुरोहितों की कृपा पर निर्भर थे। पुरोहितों के मंत्रों के माध्यम से देवताओं की कृपा प्राप्त होती थी, जो राजा की शक्ति को सुदृढ़ बनाती थी। इसके अलावा, पाठ में यह भी चर्चा की गई है कि कैसे समय के साथ राजा और प्रजा के बीच संबंध बदलते गए और कैसे राजा की शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होती गई। विवेकानंद ने यह भी संकेत दिया है कि प्रजा की शक्ति और संगठन के बिना कोई भी समाज स्थायी रूप से सफल नहीं हो सकता। अंत में, स्वामी विवेकानंद ने यह उल्लेख किया है कि भारत में स्वायत्त शासन की अवधारणा का विकास हुआ था, लेकिन यह समाज के स्तर तक नहीं पहुँच पाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रजा द्वारा प्रजा के हित के लिए शासन की आवश्यकता है, जो कि भारत के इतिहास में कहीं न कहीं देखने को मिलता है।
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