सांख्य-दर्शन | Sankhya Darshan

- श्रेणी: Vedanta and Spirituality | वेदांत और आध्यात्मिकता दार्शनिक, तत्त्वज्ञान और नीति | Philosophy शिक्षा / Education
- लेखक: अज्ञात - Unknown
- पृष्ठ : 192
- साइज: 4 MB
- वर्ष: 1936
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दो शब्द :
इस पाठ का सारांश यह है कि यह सांख्य दर्शन के अनुसार दुःख और उसके नाश के उपायों पर विचार करता है। इसका मुख्य उद्देश्य त्रिविध दुःखों - अध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदेविक - का नाश करना है। पाठ में यह बताया गया है कि अध्यात्मिक दुःख वे होते हैं जो व्यक्ति के अपने मन और भावनाओं से उत्पन्न होते हैं, जैसे ईर्ष्या और मोह। आधिभौतिक दुःख अन्य जीवों के साथ संबंध से उत्पन्न होते हैं, जबकि आधिदेविक दुःख प्राकृतिक आपदाओं से आते हैं। पाठ में यह भी चर्चा की गई है कि दुःख का नाश करने के लिए केवल भूत और वर्तमान के दुःखों का ध्यान नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये स्वयं नाशवान हैं। केवल अनागत दुःख, अर्थात् भविष्य में उत्पन्न होने वाले दुःख का नाश करना चाहिए। इसके लिए यह सुझाव दिया गया है कि दुःख के कारणों को समाप्त करना आवश्यक है, क्योंकि कारण के नाश से ही दुःख का नाश संभव है। इसमें यह भी उल्लेख है कि दृश्य पदार्थों या बाह्य वस्तुओं से दुःख का स्थायी नाश नहीं हो सकता, क्योंकि जब उन वस्तुओं का संपर्क समाप्त होता है, तब दुःख पुनः उत्पन्न हो जाता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह दृश्यमान चीजों से परे जाकर मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयास करे। आखिर में, यह स्पष्ट किया गया है कि दुःख जीव का स्वाभाविक गुण नहीं है, बल्कि यह नीतियों और अविद्या के कारण उत्पन्न होता है। पाठ में यह भी कहा गया है कि अविद्या को केवल एक भ्रांति के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि यह एक वस्तु नहीं है। इस प्रकार, पाठ मानव जीवन में दुःख के स्रोत और उसके निवारण के लिए सांख्य दर्शन के सिद्धांतों का विवेचन करता है।
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