पृथ्वीराज रासो | Prithviraj Raso

By: मोहनलाल विष्णुलाल पंडया - Mohanlal Vishnulal Pandeya


दो शब्द :

पृथ्वीराज रासो हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण काव्य ग्रंथ है, जिसे महाकवि चंदवरदाई ने लिखा है। यह ग्रंथ ऐतिहासिक दृष्टि से विवादास्पद माना जाता है, और इसके प्रकाशन की कहानी भी काफी जटिल है। 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में एशियाटिक सोसाइटी ने इसका प्रकाशन प्रारंभ किया, लेकिन विद्वानों ने इसके ऐतिहासिक प्रमाणों पर सवाल उठाते हुए इसका प्रकाशन रोक दिया। नागरीप्रचारिणी सभा के प्रमुख सदस्यों, जैसे बाबू ह्यामसुंदर दास और राधाकृष्ण दास ने इस ग्रंथ के प्रकाशन की दिशा में प्रयास किए। 1901 में नागरीप्रचारिणी पत्रिका में इस विषय पर लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें बताया गया कि इसकी छपाई में काफी कठिनाइयाँ आईं। कविराज हयामलदास ने भी रासो की आलोचना की, लेकिन इसके काव्य गुणों की भी सराहना की। महत्वपूर्ण विद्वानों ने पृथ्वीराज रासो पर गंभीर अध्ययन किया है, जिसमें ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टिकोण शामिल हैं। इसके संपादक मोहनलाल विष्णुलाल पंडया के प्रयासों से 1904 में इसका पहला भाग प्रकाशित हुआ, और इसके बाद कई अन्य भागों का प्रकाशन हुआ। हालांकि, यह ग्रंथ कई वर्षों तक अनुपलब्ध रहा, और इसके संपूर्ण प्रकाशन में कई बाधाएँ आईं। हाल के वर्षों में इस ग्रंथ के महत्व को फिर से मान्यता दी गई है, और इसकी साहित्यिक विशेषताओं को स्वीकार किया गया है। इसके बावजूद, हिंदी में इस पर गंभीर अध्ययन की कमी बनी हुई है। पृथ्वीराज रासो का यह विस्तृत संस्करण नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा 80 साल बाद प्रकाशित किया गया है, जिससे यह हिंदी जगत को एक महत्वपूर्ण उपहार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।


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