वैराग्य शतक | Vairagya Shatak

By: बाबू हरिदास वैध - Babu Haridas Vaidhya


दो शब्द :

इस पाठ में महाराज भर्तृहरि के जीवन और उनके अनुभवों के माध्यम से स्त्रियों की चालाकियों और उनके चरित्र का वर्णन किया गया है। लेखक ने भर्तृहरि की एक ऐसी रानी का उदाहरण दिया है, जो भले ही बाहर से सुन्दर और सती प्रतीत होती है, लेकिन अंदर से उसकी नीयत नीच होती है। रानी अपने पति को धोखा देती है और एक नीच व्यक्ति के साथ संबंध बनाती है, जबकि वह अपने पति के सामने सती का ढोंग करती है। लेखक ने यह भी बताया है कि स्त्रियाँ अपने स्वार्थ के लिए अपने परिवार के सदस्यों, यहां तक कि अपने बच्चों तक की जीवन को संकट में डाल सकती हैं। वे अपने कुकर्मों को छिपाने में माहिर होती हैं और दूसरों की निंदा की परवाह नहीं करतीं। पाठ में भर्तृहरि के प्रति रानी के व्यवहार का विवरण दिया गया है, जिसमें रानी ने अपने पति को अपनी चालाकियों से धोखा दिया। इस पाठ के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि मानव के गुप्त कार्यों और स्वार्थी प्रवृत्तियों का अंततः पर्दाफाश हो जाता है। परमात्मा की नजर से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता। इस प्रकार, पाठ का उद्देश्य पाठकों को स्त्रियों के चालाकियों और स्वार्थ के प्रति जागरूक करना है, जबकि भर्तृहरि के अनुभवों के माध्यम से जीवन की नश्वरता और सत्य को उजागर किया गया है।


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