श्रीमत्भगवत्गीता रहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र | Shrimadbhagvat Geeta Rahasya Athwa Karmayog Shastra

- श्रेणी: Freedom and Politics | आज़ादी और राजनीति Vedanta and Spirituality | वेदांत और आध्यात्मिकता दार्शनिक, तत्त्वज्ञान और नीति | Philosophy
- लेखक: बाल गंगाधर तिलक - Bal Gangadhar Tilak
- पृष्ठ : 952
- साइज: 40 MB
- वर्ष: 1988
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दो शब्द :
इस पाठ में श्रीमद्भगवद्गीता और विशेष रूप से लोकमान्य तिलक द्वारा रचित 'गीतारहस्य' का महत्व और उसके लेखन की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। तिलक ने अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण समय में, जब वे कारागृह में थे, 'गीतारहस्य' को लिखा। इस ग्रंथ में गीता के गूढ़ अर्थों को उजागर किया गया है और यह भारतीय आध्यात्मिकता का एक महत्वपूर्ण फल माना गया है। महात्मा गांधी ने तिलक की इस टीका को महान बताया है और इसे उनके जीवन का एक स्थायी स्मारक मानते हैं। पाठ में यह भी बताया गया है कि तिलक का ज्ञान और विद्वता अद्वितीय थी, और उन्होंने गीता के संदर्भ में जो विचार प्रस्तुत किए, वे अत्यंत मौलिक हैं। पाठ में तिलक के द्वारा किए गए विभिन्न संस्करणों का उल्लेख किया गया है, जो उन्होंने गीता के विभिन्न अध्यायों पर आधारित हैं। तिलक ने गीता के संदेशों को न केवल अपने समय में बल्कि आज भी प्रासंगिक बताया है। यह ग्रंथ केवल एक दार्शनिक कृति नहीं है, बल्कि यह समाज और संस्कृति के पुनर्निर्माण का साधन भी है। तिलक की यह कृति आज भी लोगों के लिए मार्गदर्शक है और उनके विचारों का प्रभाव आज भी महसूस किया जाता है। संक्षेप में, यह पाठ तिलक द्वारा लिखित 'गीतारहस्य' के महत्व, उसकी लेखन प्रक्रिया, और उसके द्वारा प्रस्तुत गीता के संदेशों की गहराई को उजागर करता है।
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