दिमाग ही दुश्मन है | Dimag Hi Dushman Hai

By: यू.जी. कृष्णामूर्ति - U.G. Krishnamurti


दो शब्द :

इस पाठ में यू.जी. कृष्णामूर्ति के विचारों और उनके जीवन की घटनाओं का वर्णन किया गया है। लेखक ने अपने जीवन में यू.जी. से पहली मुलाकात का अनुभव साझा किया, जिसमें यू.जी. ने उसे अपने इच्छाओं के बारे में सोचने के लिए कहा। इस सरल लेकिन गहरे प्रश्न ने लेखक के जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया और उसे अपनी इच्छाओं की तलाश में लगने के लिए प्रेरित किया। यू.जी. कृष्णामूर्ति का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके जीवन में अनेक धार्मिक व्यक्तियों का प्रभाव रहा, लेकिन उन्हें जल्दी ही यह महसूस हुआ कि पारंपरिक धार्मिक शिक्षाएँ और आचार-व्यवहार में असंगति है। उन्होंने अपने जीवन में कई अनुभव किए, जिसमें योग की शिक्षा से लेकर दांपत्य जीवन तक शामिल हैं। विवाह के बाद भी उन्हें यह अहसास हुआ कि उन्होंने एक बड़ी गलती की है, और इसके परिणामस्वरूप उन्होंने अकेले जीवन बिताने का निर्णय लिया। यू.जी. ने अपनी भटकन के दौरान कई देशों की यात्रा की और अंततः एक गहरी शांति प्राप्त की। उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्हें अचानक तेज सिरदर्द और अन्य लक्षण महसूस हुए, जिसके बाद उन्हें एक अद्वितीय क्षमता का अनुभव हुआ। वे लोगों के अतीत और भविष्य को पढ़ने की क्षमता विकसित करने लगे। इस प्रकार, पाठ यू.जी. कृष्णामूर्ति के विचारों, उनके जीवन के अनुभवों और उनके द्वारा दी गई शिक्षा के महत्व को उजागर करता है। लेखक ने यू.जी. के विचारों को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास किया और उनके प्रति गहन रुचि विकसित की, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने यू.जी. की एक पुस्तक का हिंदी में अनुवाद किया।


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