मुद्राराक्षस | Mudrarakshas

By: भारतेन्दु हरिचन्द्र - Bharatendru Harichandra


दो शब्द :

महाकवि विशाखदत्त की कृति "सुद्धाराक्षस" एक महत्वपूर्ण नाटक है, जिसे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अनुवादित किया है। यह नाटक हिंदी साहित्य में नाटकों की परंपरा को समृद्ध करने वाला है। इसका मूल संस्कृत में है और यह नाटक भारतीय नाट्य शास्त्र की महत्वपूर्ण विशेषताओं को दर्शाता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस नाटक के अनुवाद के दौरान विभिन्न संस्कृत संस्करणों की तुलना की और यह पाया कि कई स्थानों पर पाठ में भिन्नताएं हैं। उन्होंने नाटक की संरचना, पात्रों और प्रमुख रसों का विश्लेषण किया है। नाटक में अद्भुतता, वीरता और संघर्ष जैसे तत्व प्रमुख हैं। नाटककार विशाखदत्त के बारे में जानकारी बहुत सीमित है। उनके पिता का नाम महाराज प्रथु है और उनके बारे में कुछ अन्य विवरण भी मिलते हैं। नाटक का इतिहास भी समृद्ध है, जिसमें कालिदास, भास और अन्य महान नाटककारों का योगदान है। सिद्धांत के अनुसार, नाटक की रचना में मुख्यतः पात्रों की भूमिका और उनके संवाद महत्वपूर्ण होते हैं। नाटककार ने विभिन्न प्रकार के नायकों का वर्णन किया है, जैसे धीरोदात, धीरोदात, आदि। सिद्धांत में यह भी बताया गया है कि नाटक के मुख्य तत्वों में वस्तु, प्रवृत्ति, और पात्रों का विकास शामिल होता है। नाटक का आरंभ, यत्न, प्राप्ति और फलागम जैसे चरण होते हैं। भारत में नाटकों का विकास प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक हुआ है, जिसमें कई महत्वपूर्ण नाटककारों का योगदान है। हालाँकि, हिंदी में नाटकों की कमी है और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी नाट्य लेखन का अग्रदूत माना जाता है। इस प्रकार, "सुद्धाराक्षस" न केवल विशाखदत्त की रचनात्मकता का प्रमाण है, बल्कि भारतीय नाट्य परंपरा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।


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