दो शब्द :

इस पाठ का सारांश इस प्रकार है: लखनऊ विश्वविद्यालय ने 'पातंजल योगदर्शन' का एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ प्रकाशित किया है, जिसका अनुवाद और टीका सांख्ययोगाचार्य श्रीमद् हरिहरानन्द आरण्य द्वारा बंगला में किया गया था। यह ग्रंथ योग दर्शन की गहन समझ प्रदान करता है और पहले इसे हिंदी में उपलब्ध नहीं कराया गया था। इसके अनुवाद के लिए भगीरथ मिश्र, हरिकृष्ण अवस्थी और ब्रजकिशोर मिश्र ने मेहनत की है। इस ग्रंथ में योग के सिद्धांत, उसके अभ्यास और साधना के तरीकों का विस्तृत वर्णन है। यह पुस्तक न केवल विद्वानों के लिए, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी है, क्योंकि यह योग की गहराई को सरल और स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत करती है। इसके अलावा, इसमें श्री हरिहरानन्द आरण्य के ज्ञान और अनुभव का समावेश है, जो इसे एक प्रामाणिक स्रोत बनाता है। संक्षेप में, यह ग्रंथ योग दर्शन को हिंदी पाठकों के लिए सुलभ बनाता है और इसके माध्यम से पाठकों को योग की गहराइयों में जाने का अवसर प्रदान करता है।


Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *