रोगी-परिक्षाविधि | Rogi-parikshavidhi

By: राजेश्वरदत्त शास्री - Rajeshwar dutt Shastri


दो शब्द :

इस पाठ का सारांश इस प्रकार है: पाठ का मुख्य विषय आयुर्वेद की रोग-परीक्षा विधियों का विकास और उनका महत्व है। आयुर्वेद का इतिहास और उसकी प्राचीन पद्धतियों का वर्णन करते हुए, यह बताया गया है कि कैसे समय के साथ आयुर्वेद में सुधार और आधुनिकता की आवश्यकता महसूस हुई है। आज के युग में, आयुर्वेदिक चिकित्सकों को न केवल प्राचीन विधियों का ज्ञान होना चाहिए, बल्कि आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग करना चाहिए। पाठ में यह भी उल्लेखित है कि रोग-परीक्षा का सही ढंग से संपन्न होना अत्यंत आवश्यक है, ताकि चिकित्सा में सफलता प्राप्त की जा सके। इसमें विभिन्न प्रकार की परीक्षाओं, जैसे कि प्रत्यक्ष परीक्षा, पश्चेन्द्रिय परीक्षा, और प्रश्न-परीक्षा का विवरण दिया गया है। पुस्तक की भूमिका में विद्या राजेश्वरदत्त शास्त्री ने आयुर्वेद के उत्थान के लिए पुरानी पद्धतियों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने यह भी कहा है कि आयुर्वेद के सिद्धांतों और तकनीकों को विश्व के समक्ष लाना आवश्यक है, ताकि चिकित्सा विज्ञान में आयुर्वेद की विशेषता को पहचान मिल सके। आखिरकार, पाठ का उद्देश्य यह है कि आयुर्वेद के छात्र और चिकित्सक इन विधियों को अपनाकर रोग निदान में कुशलता प्राप्त करें और आयुर्वेद के ज्ञान का लाभ समाज तक पहुँचाएं।


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