तर्कभाषा | Tarkbhasha
- श्रेणी: साहित्य / Literature हिंदी / Hindi
- लेखक: केशव प्रसाद मिश्र - Keshav Prasad Mishr
- पृष्ठ : 473
- साइज: 19 MB
- वर्ष: 1968
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दो शब्द :
भारत का इतिहास और संस्कृति अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। यह न केवल एक सामाजिक और राजनीतिक इकाई है, बल्कि ज्ञान और विज्ञान की भी गहरी जड़ों वाला राष्ट्र है। भारत की ज्ञान परंपरा में 'आन्वीक्षिकी' का विशेष महत्व है, जो तात्त्विक विषयों की गहराई में जाकर उनके स्वरूप को समझाने वाली विद्या है। इसे न्यायशास्त्र के रूप में भी जाना जाता है, जिसके माध्यम से प्रमाणों का उपयोग करके वस्तुओं और उनके तत्त्वों का निर्धारण किया जाता है। न्यायशास्त्र का मूल ग्रंथ 'न्यायसूत्र' है, जिसे गौतम मुनि ने लिखा। यह शास्त्र ज्ञान के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसमें प्रमेय, प्रमाण, संशय, आदि सोलह पदार्थों की चर्चा की गई है, जो मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में सहायक होते हैं। भारत में न्यायशास्त्र के दो प्रमुख भेद हैं: वैदिक न्याय और अवैदिक न्याय। वैदिक न्याय में गौतमीय न्याय, काणाद न्याय आदि शामिल हैं, जबकि अवैदिक न्याय में बौद्ध और जैन न्याय शामिल हैं। न्यायशास्त्र का अध्ययन न केवल ज्ञान की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आत्मा के साक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति का भी साधन है। न्यायशास्त्र की भाषा और शैली में भी भिन्नता है; प्राचीन न्याय अधिक संक्षिप्त और प्रतीकात्मक है, जबकि नव्य न्याय स्पष्ट और विस्तृत है। इन दोनों में विषय का प्रतिपादन और विचार करने की शैली में भी भेद है। इस प्रकार, न्यायशास्त्र न केवल तात्त्विक ज्ञान का संग्रह है, बल्कि यह जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर देने का माध्यम भी है, जो मानव को आत्मा के सत्य और मोक्ष की ओर ले जाता है।
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