श्री हरी गीता | Shri Hari Geeta

- श्रेणी: Hindu Scriptures | हिंदू धर्मग्रंथ गीति-काव्य/ Geeti Kavya ग्रन्थ / granth धार्मिक / Religious
- लेखक: दीनानाथ भार्गव - Dinanath Bhargav
- पृष्ठ : 366
- साइज: 6 MB
- वर्ष: 1937
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दो शब्द :
इस पाठ में गीता के विभिन्न अध्यायों और उनके महत्व का उल्लेख किया गया है। 1640 से 1642 के बीच गीता के चौथे से लेकर बारहवें अध्याय तक के प्रकाशन की जानकारी दी गई है। लेखक ने गीता के भाष्य के लिए कई महत्वपूर्ण ग्रंथों और विचारों का संदर्भ लिया है, जैसे कि श्रीमद्भगवद्गीता का शास्त्रार्थ, मधुसूदन भाष्य, आदि। गीता को एक दिव्य वाणी माना गया है, जो लोगों को प्रेरणा और मार्गदर्शन देती है। लेखक ने गीता के अध्ययन के दौरान जो अनुभव प्राप्त किए हैं, उनका भी उल्लेख किया है। उन्होंने गीता को एक ऐसा ग्रंथ बताया है, जिसके प्रति समय-समय पर नये दृष्टिकोण और व्याख्याएं आती रहेंगी। गीता की मौलिकता और व्यापकता के कारण इसे समझने और लिखने का काम कभी समाप्त नहीं होगा। इसके अलावा, पाठ में कर्म के महत्व, आत्मा की शुद्धता, और निष्काम कर्म के सिद्धांत का भी उल्लेख किया गया है। लेखक ने कर्म करने के अधिकार का लाभ उठाने और योग में स्थित रहने की आवश्यकता पर बल दिया है। गीता का संदेश है कि मानव को अपने कर्म में असंगति और मिथ्याचार से दूर रहना चाहिए ताकि वह आत्मज्ञान की ओर अग्रसर हो सके। अंत में, गीता के सिद्धांतों को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी गई है, जिससे व्यक्ति सुख और शांति का अनुभव कर सके। लेखक ने गीता के सरल और सरस अनुवाद के माध्यम से इसे आम जनता के लिए सुलभ बनाने का प्रयास किया है।
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