धर्मसिन्धुः | Dharmasindhu by


दो शब्द :

यह पाठ धर्म की आवश्यकता और उसके महत्व को स्पष्ट करता है। इसमें बताया गया है कि धर्म का अर्थ केवल धार्मिक आचार-व्यवहार नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है। धर्म को 'धृत' और 'घारण' जैसे संस्कृत शब्दों से जोड़ा गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि धर्म वह तत्व है जो समाज और व्यक्ति को धारण करता है। पाठ में यह कहा गया है कि धर्म का पालन करने से व्यक्ति को न केवल इस संसार में सुख और शांति मिलती है, बल्कि परलोक में भी उसका कल्याण होता है। इसके साथ ही, स्वधर्म और परधर्म के बीच का भेद भी स्पष्ट किया गया है। स्वधर्म का पालन करना आवश्यक है, जबकि परधर्म को अपनाना उचित नहीं है। धर्म के विभिन्न अर्थों और परिभाषाओं पर चर्चा करते हुए यह भी बताया गया है कि धर्म हमेशा सत्य और न्याय के साथ जुड़ा होता है। धर्म के चार स्तंभ—यज्ञ, अध्ययन, दान, और ब्रह्मचर्य—को भी रेखांकित किया गया है, जो समाज के विकास और व्यक्ति की उन्नति के लिए आवश्यक हैं। अंततः, पाठ में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि धर्म न केवल व्यक्तिगत जीवन का आधार है, बल्कि यह संपूर्ण समाज की स्थिरता और प्रगति के लिए भी अनिवार्य है। एक संतुलित और धर्मनिष्ठ जीवन जीने से ही व्यक्ति और समाज में सुख, शांति और संतोष की प्राप्ति संभव है।


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