हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास | Hindi Sahitya Ka Alochanatmak Itihas

By: रामकुमार वर्मा - Ramkumar Varma


दो शब्द :

हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसे डॉ. रामकुमार वर्मा ने प्रस्तुत किया है। इस ग्रंथ में हिन्दी साहित्य के इतिहास का विस्तृत और गहन अध्ययन किया गया है। लेखक का मानना है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्योंकि इसमें अनेक जटिलताएँ और गुत्थियाँ हैं, जो भारतीय साहित्य के अन्य इतिहासों में नहीं पाई जातीं। लेखक ने यह उल्लेख किया है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अब तक पूर्ण रूप से लिखा नहीं गया है और इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उन्होंने अपनी लेखन यात्रा की शुरुआत तब की, जब उन्हें छात्रों को इतिहास पढ़ाने का अवसर मिला। उनके दृष्टिकोण में आलोचनात्मक दृष्टि के साथ-साथ साहित्यिक प्रवृत्तियों की विस्तृत चर्चा की गई है। लेखक ने यह भी कहा है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अपभ्रंश-काल से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक बिखरा हुआ था और इसे एकत्रित करने का प्रयास बहुत बाद में हुआ। उन्होंने विभिन्न कवियों और भकतों के उल्लेख का भी जिक्र किया, लेकिन इसे समष्टि रूप में नहीं देखा गया। इसके अलावा, उन्होंने साहित्य और संस्कृति के आपसी संबंध को भी रेखांकित किया है, यह बताते हुए कि स्वतंत्रता के बाद हिन्दी का महत्त्व और बढ़ गया है। लेखक ने हिन्दी साहित्य की प्रवृत्तियों, विचारधाराओं और कवियों के विवरण को संकलित करने का प्रयास किया है, जिससे पाठकों को हिन्दी साहित्य के इतिहास को समझने में मदद मिल सके। उन्होंने यह भी आशा व्यक्त की है कि भविष्य में इस विषय पर और अधिक शोध और अध्ययन होंगे, जिससे हिन्दी साहित्य का इतिहास और भी स्पष्ट हो सकेगा। इस ग्रंथ में दी गई सामग्री और दृष्टिकोण हिन्दी साहित्य के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण योगदान है, जो पाठकों को एक समग्र और आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान करता है।


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