मालिका | Malika

By: अज्ञात - Unknown
मालिका | Malika by


दो शब्द :

इस पाठ में प्रणय नामक एक युवा व्यक्ति की कहानी है, जो अपने कॉलेज के रास्ते में एक नीम के पेड़ के नीचे बच्चों के साथ खेलने का आनंद लेता है। वह बच्चों के भोलेपन और सरलता से प्रेरित होता है। एक दिन, वह वहाँ एक छोटे बच्चे को खेलते हुए देखता है, जिसकी माँ का हाल बहुत बुरा है। प्रणय उस बच्चे के प्रति आकर्षित होता है और उसके साथ खेलने की कोशिश करता है, लेकिन उसे उस बच्चे की निराशा का सामना करना पड़ता है जब वह उसे एक पेन्सिल देता है और बच्चा उसे स्वीकार नहीं करता। प्रणय इस स्थिति में गहरे भावनात्मक संघर्ष में डूब जाता है। वह महसूस करता है कि जीवन की सच्चाई कितनी कठिन हो सकती है, और वह बालक की निराशा को देखकर रोने लगता है। प्रणय का दिल उस बच्चे के प्रति सहानुभूति से भर जाता है। अगले दिन वह कॉलेज नहीं जाता और उसी नीम के पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगता है। उसकी मुलाकात उस बच्चे की दादी से होती है, जो अपने पोते की देखभाल कर रही है। वह बताती है कि बच्चे का जन्म कठिन परिस्थितियों में हुआ है और उनके पास कोई सहारा नहीं है। प्रणय उस दादी के साथ बातचीत करता है और धीरे-धीरे उनके बीच एक संबंध विकसित होता है। वह बच्चे को गले लगाता है और उसकी निर्दोषता में खो जाता है। इस कथा में प्रणय के मन में उठ रहे भावनात्मक उथल-पुथल, बच्चों की मासूमियत और दादी की कठिनाइयों का चित्रण है। अंततः, यह कहानी जीवन की वेदनाओं, प्रेम और मानवता की गहराई को उजागर करती है। प्रणय की संवेदनशीलता और दया से यह स्पष्ट होता है कि मानवता की सच्ची पहचान उसके दूसरों के प्रति दयालुता और सहानुभूति में है।


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