पुराण-विमर्श | Puran-vimarsh

By: बलदेव उपाध्याय - Baldev upadhayay


दो शब्द :

इस पाठ में पुराणों के विषय में चर्चा की गई है, जिसमें मुख्य रूप से उनके पांच लक्षणों का वर्णन किया गया है: सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (पुनः सृष्टि), वंश (वंश वृत्तांत), मन्वंतर (समय चक्र) और वंशानुचरित (वंश के अनुक्रम)। पाठ में पुराणों की सृष्टि के तत्वों पर भी जोर दिया गया है, जिसमें पुराणों के सृष्टि-विज्ञान का वर्णन किया गया है। पुराणों में सृष्टि का प्रारंभिक तत्व 'सर्ग' है, जो कि पुराणों के मुख्य लक्षणों में से एक है। सृष्टि की प्रक्रिया में सांख्य दर्शन का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, हालाँकि पौराणिक दृष्टिकोण में इसका अपना विशेष महत्व है। पुराणों में प्रकृति और पुरुष का संबंध ब्रह्म के माध्यम से दर्शाया गया है, जिसमें ब्रह्म को सृष्टि का प्रेरक माना गया है। सृष्टि के विभिन्न प्रकारों को नवसर्गों में वर्गीकृत किया गया है। इनमें प्राकृतसर्ग, वेकृतसर्ग और प्राकृत-बेकृत सर्ग शामिल हैं। प्राकृतसर्ग नैसर्गिक रूप से उत्पन्न होते हैं, जबकि वेकृतसर्ग बुद्धि द्वारा रचित होते हैं। पुराणों में सृष्टि के नौ प्रकार के सर्गों का विवरण दिया गया है, जिसमें ब्रह्मसर्ग, भूतसर्ग, वेकारिक सर्ग, मुख्यसर्ग, तियंक सर्ग, देवसर्ग, सानुषसर्ग और अनुग्रह सर्ग शामिल हैं। इस प्रकार, पुराणों में सृष्टि के विभिन्न पहलुओं, उनके स्रोत और प्रक्रियाओं का विवेचन किया गया है, जो भारतीय दर्शन और धार्मिक परंपराओं की गहराई को दर्शाता है।


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