हिंदी व्याकरण | Hindi Vyakaran

- श्रेणी: Self-Help and Motivational | स्व सहायता पुस्तक और प्रेरक भाषा / Language
- लेखक: पं. कामताप्रसाद गुरु - Pt. Kamtaprasad Guru
- पृष्ठ : 756
- साइज: 41 MB
- वर्ष: 1957
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दो शब्द :
इस पाठ में हिंदी व्याकरण के विकास, उसके महत्व और इतिहास पर प्रकाश डाला गया है। इसकी शुरुआत जयपुर के राजा औश्रजीतसिंह जी से होती है, जिन्होंने विद्या और विज्ञान को बहुत महत्व दिया। स्वामी विवेकानंद के साथ उनकी गहरी चर्चा का उल्लेख किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राजा की विद्या के प्रति गहरी रुचि थी। राजा की संतानों के विवाहों और उनकी संतति के बारे में जानकारी दी गई है, जिसमें यह बताया गया है कि कैसे विभिन्न राजघरानों के बीच संबंध स्थापित हुए। इसके बाद, भामती दु:खकुमारी जी की शिक्षा और उनके कार्यों का उल्लेख किया गया है। वे बहुत शिक्षित थीं और हिंदी में उत्कृष्ट लेखन करती थीं। उनकी अंतिम इच्छाओं की पूर्ति के लिए राजकुमार उमेदसिंह जी ने कई योजनाएं बनाईं, जिसमें हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार शामिल था। इसके अलावा, यह पाठ हिंदी व्याकरण के लेखन की प्रक्रिया और उसके लिए प्रेरणा स्रोतों के बारे में बताता है। लेखक ने विभिन्न विद्वानों और पुस्तकों से सहायता ली है और यह स्पष्ट किया है कि इस व्याकरण में हिंदी भाषा के विभिन्न रूपों और प्रयोगों का विवेचन किया गया है। पुस्तक के उद्देश्य और व्याकरण के सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए, यह कहा गया है कि व्याकरण का निर्माण भाषा के साहित्य की पूर्ति और उसके नियमों को स्थापित करने का कार्य करता है। अंत में, यह उल्लेख किया गया है कि हिंदी का व्याकरण एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसे समझने और व्यवस्थित करने की आवश्यकता है।
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