तीसमारखाँ | Tisamarakha

- श्रेणी: नाटक/ Drama साहित्य / Literature
- लेखक: अज्ञात - Unknown
- पृष्ठ : 68
- साइज: 1 MB
- वर्ष: 1988
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दो शब्द :
इस पाठ में ग्रामीण जीवन की समस्याओं और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा की गई है। रंगू और सायर नामक पात्रों के बीच बातचीत होती है, जिसमें वे अपने जीवन की कठिनाइयों, रोजगार की कमी और गांव में बढ़ती बुराइयों के बारे में बात करते हैं। रंगू अपने अनुभव साझा करता है कि कैसे मील (भोजन) बंद हो गया है और लोग बेरोजगारी से परेशान हैं। गांव में दारू पीने, मार-पीट और गुंडागर्दी बढ़ने की भी चर्चा होती है। पात्र एक-दूसरे से यह भी पूछते हैं कि क्या सुधार की कोई संभावना है, लेकिन उन्हें लगता है कि लोग इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए इच्छुक नहीं हैं। सामाजिक सुधार की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए, रंगू कहता है कि हालात को सुधारने के लिए लोगों को खुद जागरूक होना होगा। वे शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति लोगों की उदासीनता को भी उजागर करते हैं। अंत में, यह संवाद इस बात को दर्शाता है कि गांव में सुधार लाने के लिए सामूहिक प्रयास और जागरूकता की जरूरत है, लेकिन वर्तमान में लोग अपने व्यक्तिगत हितों में ही लिप्त हैं। यह पाठ ग्रामीण जीवन की वास्तविकताओं, संघर्षों और समाज में व्याप्त बुराइयों को उजागर करता है।
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