ब्रह्मचर्य और आत्मा समाये | Bramachary Aur Aatmasanyam

- श्रेणी: विज्ञान / Science
- लेखक: श्री जवाहर विद्यापीठ - Shri Jawahar Vidhyapeeth
- पृष्ठ : 370
- साइज: 5 MB
- वर्ष: 1934
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दो शब्द :
इस पाठ में ब्रह्मचर्य और आत्मसंयम के महत्व पर चर्चा की गई है। महात्मा गांधी ने इसे आत्मा की शुद्धता और सत्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ब्रह्मचर्य का पालन केवल शारीरिक संयम से नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म के संयम से भी करना चाहिए। गांधीजी ने बताया है कि केवल भोगों का त्याग करना ही पर्याप्त नहीं है; इसके साथ ही मन में विकारों को नियंत्रित करना भी आवश्यक है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया है कि अहिंसा का पालन ब्रह्मचर्य के बिना संभव नहीं है, क्योंकि प्रेम और सच्चा संबंध तभी बनता है जब व्यक्ति अपने इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है। पाठ में यह भी कहा गया है कि गृहस्थ जीवन में भी ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है। विवाह के बाद भी, यदि व्यक्ति अपनी पत्नी या पति को अपने प्रेम का पूरा समर्पण देता है, तो वह ब्रह्मचर्य का पालन कर सकता है। गांधीजी ने यह स्पष्ट किया है कि ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शारीरिक संयम नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। अंत में, गांधीजी ने यह सुझाव दिया है कि ब्रह्मचर्य का पालन करना कठिन है, लेकिन इसे संभव बनाने के लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति सच्चे मन से ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह सच्चाई और प्रेम के निकट रहता है।
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