जाती आओर मनोविज्ञान | Jati Aour Manovigyan

By: ओटो मिलनवर्ग - Aoto milanVarg


दो शब्द :

इस पाठ में लेखक झोटो सिलनबर्ग ने जातीय प्रवृत्तियों और सांस्कृतिक विज्ञान के संदर्भ में जातियों के बीच भेदभाव और उनकी सामाजिक स्थिति का विश्लेषण किया है। उन्होंने यह बताया है कि कई लोग मानते हैं कि कुछ जातियाँ अन्य जातियों से ऊँची या नीची हैं, जो नाजी जर्मनी जैसे उदाहरणों में स्पष्ट रूप से देखा गया है। यह धारणा न केवल राजनीतिक विचारधारा से बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्रभावित होती है। लेखक ने इस बात पर जोर दिया है कि जाति और बौद्धिकता के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता है। मनोविज्ञान में परीक्षणों के माध्यम से विभिन्न जातियों की योग्यता का मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया है, लेकिन यह देखा गया है कि सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का प्रभाव इस मूल्यांकन पर पड़ता है। बिनेट के परीक्षणों का उदाहरण देते हुए, लेखक ने बताया कि जब परीक्षित व्यक्तियों की सामाजिक स्थिति समान नहीं होती, तो उनके परिणाम भिन्न हो सकते हैं। पाठ में यह भी बताया गया है कि व्यक्ति की मनोवृत्ति, शिक्षा और सामाजिक अनुभव उसकी परीक्षण में सफलता पर प्रभाव डालते हैं। विभिन्न संस्कृतियों में परीक्षा के प्रति दृष्टिकोण भिन्न होते हैं, जिससे परीक्षण के परिणाम प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के संदर्भ में यह देखा गया कि वे सामूहिक रूप से समस्याओं का समाधान ढूंढते हैं, जबकि परीक्षण में उनसे व्यक्तिगत प्रयास की अपेक्षा की गई थी। इस प्रकार, लेखक ने यह निष्कर्ष निकाला है कि जातियों के बीच भेदभाव और उनकी योग्यता के संदर्भ में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, और केवल सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर निष्कर्ष निकालना गलत है। उन्होंने मानव अधिकारों के संदर्भ में यह भी स्पष्ट किया कि सभी व्यक्तियों को समान अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त है, और इस दिशा में भेदभाव को समाप्त करने की आवश्यकता है।


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