तोड़ो कारा तोड़ो | Todo Kara Todo

By: नरेन्द्र कोहली - Narendra kohli


दो शब्द :

यह पाठ स्वामी विवेकानंद के अनुयायी अखंडानंद की कठिनाइयों और उनके समर्पण के बारे में है। अखंडानंद एक ऐसे परिवेश में रह रहे थे, जहाँ उन्हें मानसिक और शारीरिक असुविधा हो रही थी। वे अपने मित्र हृदय बाबू के घर में रह रहे थे, लेकिन वहाँ का ईसाई वातावरण उनके लिए सहनशील नहीं था। उन्होंने स्वामी विवेकानंद से कहा कि वे वहाँ और नहीं रह सकते। स्वामी विवेकानंद ने उनकी चिंताओं को समझा और अखंडानंद की भलाई के लिए एक समाधान खोजने का प्रयास किया। स्वामी ने हृदय बाबू के घर जाने का निश्चय किया ताकि वे उन्हें सूचित कर सकें कि अखंडानंद अब वहाँ नहीं लौटेंगे। हृदय बाबू और उनके परिवार के सदस्यों के साथ बातचीत के दौरान, स्वामी ने ईसाई पादरियों के दृष्टिकोण का विरोध किया और अपने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की। स्वामी ने अखंडानंद के लिए एक नया स्थान खोजने का प्रयास किया, ताकि वे स्वस्थ हो सकें। अंततः, एक वकील ने अखंडानंद की देखभाल के लिए एक छोटे मकान का प्रबंध किया, जहाँ वे ठीक हो रहे थे। पाठ का अंत इस विचार पर होता है कि स्वामी और उनके साथी अब यात्रा करने के लिए तैयार हैं, लेकिन वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि अखंडानंद को वहाँ बेहतर देखभाल मिले। इस प्रकार, यह पाठ अखंडानंद के स्वास्थ्य, स्वामी विवेकानंद के समर्थन और उनके धार्मिक विश्वासों के प्रति निष्ठा को दर्शाता है।


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