दो शब्द :

इस पाठ का सारांश इस प्रकार है: यह ग्रंथ 'यश की धरोहर' शहीदों के संस्मरणों का संग्रह है, जिसमें प्रमुख रूप से भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव और नारायणदास खरे के बलिदानों का वर्णन किया गया है। लेखक भगवानदास माहौर, सदाशिवराव मलकाापुरकर और शिव वर्मा ने मिलकर इन शहीदों की वीरता और उनके बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित की है। पुस्तक की भूमिका में बताया गया है कि शहीदों की याद और उनके बलिदान से ही समाज में स्वार्थ और भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक उत्कृष्टता की भावना जागृत हो सकती है। शहीदों के बलिदान को याद करके हम अपने मन में मानवीयता की आशा को जीवित रख सकते हैं। ग्रंथ के संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी ने इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस ग्रंथ में शहीदों के साहस, त्याग और देशभक्ति का उल्लेख किया गया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। इन शहीदों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पाठ में यह भी उल्लेखित है कि शहीद राजगुरु की शहादत की बेताबी और देशभक्तों के प्रति उनकी निष्ठा की भावना अत्यधिक प्रेरणादायक थी। इस प्रकार, 'यश की धरोहर' एक महत्वपूर्ण कृति है, जो शहीदों के बलिदान को स्मरण करते हुए उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करती है और उनके जीवन से प्रेरणा लेने की प्रेरणा देती है।


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