प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल | Historical Geography Of Ancient India

- श्रेणी: इतिहास / History भारत / India
- लेखक: बिमल चरण लाहा - Bimal Charan Laha
- पृष्ठ : 676
- साइज: 46 MB
- वर्ष: 1972
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दो शब्द :
यह पाठ भारत के भौगोलिक स्वरूप और ऐतिहासिक भूगोल के बारे में जानकारी प्रस्तुत करता है। भारतीय उपमहाद्वीप का आकार और सीमाएं विभिन्न प्राचीन लेखकों द्वारा वर्णित की गई हैं। चीनी यात्री फाह-किया-लिह-तो और युवान-च्वांग ने भारत के आकार को अर्धचंद्राकार बताया है, जिसमें उत्तर में चौड़ाई अधिक और दक्षिण में संकीर्णता है। मेगस्थनीज और डायमेकस ने भी भारत के आकार के बारे में उल्लेख किया है, जिसमें इसकी चौड़ाई और लंबाई का विवरण दिया गया है। भारतीय ग्रंथों के अनुसार, भारत के विभिन्न भागों को पांच परंपरागत क्षेत्रों में विभाजित किया गया है: मध्यदेश, उत्तरापथ, प्राच्य, दक्षिणापथ, और अपरान्त। इन क्षेत्रों की सीमाएँ और विशेषताएँ ब्राह्मण और बौद्ध ग्रंथों में वर्णित हैं। मध्यदेश को आर्यावर्त का केंद्र माना गया है, जहाँ आर्य सभ्यता का विकास हुआ। इसके अलावा, पाठ में यह भी बताया गया है कि विभिन्न नदियाँ और पर्वत भारतीय भूगोल में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। बौद्ध ग्रंथों में भी मध्यदेश की सीमाएँ विस्तृत की गई हैं, जो कि विभिन्न नगरों और भूभागों को शामिल करती हैं। इस प्रकार, यह पाठ भारत के ऐतिहासिक भूगोल, प्राचीन ग्रंथों द्वारा वर्णित क्षेत्रों और उनके महत्व पर ध्यान केंद्रित करता है।
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