जातीभास्कर | jatibhaskar

- श्रेणी: Cultural Studies | सभ्यता और संस्कृति Hindu Scriptures | हिंदू धर्मग्रंथ इतिहास / History
- लेखक: खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas
- पृष्ठ : 466
- साइज: 30 MB
- वर्ष: 1926
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दो शब्द :
इस पाठ में जाति और उन्नति के संदर्भ में विचार किया गया है। लेखक ने यह बताया है कि व्यक्ति को अपनी जाति और धर्म के अनुसार कार्य करना चाहिए, ताकि वह आत्मोन्नति कर सके। इस प्रक्रिया में प्रमाद से बचना आवश्यक है, क्योंकि प्रमाद के कारण व्यक्ति आधोगति की ओर बढ़ सकता है। भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों का संदर्भ देते हुए, लेखक ने कहा है कि चार वर्णों की व्यवस्था और उनके गुणों का पालन करना चाहिए। जाति का महत्व और वैदिक प्रमाणों के आधार पर विभिन्न जातियों का वर्णन किया गया है। लेखक ने एक पुस्तक का उल्लेख किया है, जिसमें जातियों की उत्पत्ति और उनके भेदों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह भी कहा गया है कि उन्नति के लिए उचित मार्ग का चयन करना आवश्यक है। जातियों की उन्नति के लिए धार्मिक और संस्कार आधारित आचरण अपनाने की सलाह दी गई है। लेखक ने यह भी बताया कि जातियों की उन्नति का मार्ग केवल सत्य और धर्म के पालन से ही संभव है। संक्षेप में, यह पाठ जातियों, उनके अधिकार और उन्नति के लिए आवश्यक प्रयासों के बारे में है, जिसमें धार्मिक शिक्षाओं और सामाजिक व्यवस्था का पालन करने पर जोर दिया गया है।
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